कहानी 1

बात तब की है जब राम वनवास को गए थे। रास्ते में उन्हे बहुत से राक्षस मिले जो वनों में रहते थे, और साधु संतों को परेशान करते थे। उनमे से एक राक्षस जो बहुत क्रूर और शक्तिशाली था, राम जी को आता देख अपना मायावी रूप धारण करके अदृश्य होकर बोलने लगा की- " हे मनुष्य, तू इस जंगल से क्यों जा रहा है? क्या तूने मेरे बारे में नहीं सुना? क्या तुझे डर नहीं लगता? " इस तरह का प्रश्न उसने राम जी से किया राम जी बगैर डरे साहस के साथ उससे कहते हैं कि- हे अहंकारी दुष्ट राक्षस तू छिपकर क्यूँ बात कर रहा है? यदि तुझमें साहस है तो सामने आ। दोस्तों!   फिर वह राक्षस राम जी के सामने बहुत विशाल और भयानक रूप में सामने आया। इसके बाद उन दोनो में युद्ध हुआ, भयंकर युद्ध। लेकिन मित्रों अंत में जीत हमारे राम जी कि हुई क्योंकि वे सत्य के साथ थे। हारने के बाद उसने अपनी प्राण रक्षा के लिए राम जी से क्षमा मांगी। राम जी ने उसे क्षमा कर दिया और उससे वचन लिया कि, वह अब किसी भी मनुष्य को परेशान न करे।
   तो दोस्तों हमें इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि
1. हमे साहसी और सत्य का साथ देना चाहिए।
2. यदि हमसे कोई इस शर्त पर क्षमा मांगे की वह सुधर जायेगा  तो हमे उसे क्षमा कर देना चाहिए।

-- मोहित पाण्डेय

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  1. यदि उपर्युक्त अनुच्छेद में कुछ त्रुटि है तो हमें अपनी प्रतिक्रिया दें।

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